Chandigarh 29, November (Pooja Goyal)
पंचकूला । अयोध्या में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद का विवाद सर्वोच्च न्यायालय में विचारधीन है। दिसंबर के पहले सप्ताह से मामले की सुनवाई शुर होनी है। इसमेें प्रमुख पक्ष के तौर पर देश के अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर के वंशज और उत्तराधिकारी होने का दावा करने वाले प्रिस याकुब हबीबुद्दीन टूसी इन दिनों चर्चित हैं। हिमाचल प्रदेश के दो रायल परिवारों के आमंत्रण पर वे पंचकूला के रामगढ़ फोर्ट आए। मुद्दा चूंकि न्यायालय में विचारधीन है इसलिए उन्होंने सीधे तौर पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन इतना बताया कि फैसले के बाद सद्भाव कायम होगा। उनके अपरोक्ष इशारे का अंदाज लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं था।
हिमाचल प्रदेेश की सीबा रियायत के राजपरिवार प्रमुख अशोक ठाकुर, कुटलेहडड़ रियायत राज परिवार के प्रमुख बुद्धिश्वर पाल और बिलासपुर राजपरिवार के शुभेंद्र नारायण चंद के साथ इस मुद्दे पर करीब दो घंटे तक बातचीत चली। टूसी ने बताया कि जो उनके बहादुरशाह जफर के असली वारिस होने पर संदेह करते हैं उन्हें न्यायालय में जाना चाहिेए। उन्हें डीएनए टेस्ट के बाद बाकायदा न्यायालय ने ही जफर के वंशज होने का प्रमाणित किया है।
यह पूछने पर कि क्या अयोध्या में राम मंदिर बनने में अब कोई बाधा नहीं है। वे बोले, सर्वोच्च न्यायालय का फैसला दोनों पक्षों को मंजूर होगा। वैसे आपसी सहमति से ही मामले का समाधान निकलेगा। इसके लिए उन्होंने प्रयास कर लिया है। अब श्रीश्री रविशंकर मध्यस्थता का प्रयास कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है जरूर सार्थक हल निकलेगा। यही वह चाहते हैं और देश का आवाम भी यही चाहता होगा।
सीबा रियासत प्रमुख अशोक ठाकुर ने टूसी के विचारों पर सहमति जताते हुए उम्मीद जताई दिसंबर में जरूर राम मंदिर बनने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। अन्य दोनों राज परिवारों के प्रमुखों ने भी प्रिंस याकूब की सकारात्मक सोच को भविष्य की उम्मीद बताया.। पद्मावती पर जारी विवाद पर टूसी ने किसी तरह की टिप्पणी नहीं की जबकि राज परिवार प्रमुखों ने कहा कि इतिहास से छेड़छाड़ सहन नहींं की जा सकती। उन पर किसी पार्टी विशेष के हिमायती होने के आरोप झूठे हैं। न उन्हें राज्यसभा सदस्य बनना है और न ही कोई चुनाव लडऩा है। वह देश में सद्भावना बनाने के पक्षधर है और यह कैसे होगा जल्द ही स्पष्ट हो जाएगा।
 फिल्म को मेवाड़ राजपरिवार के अलावा देश के विभिन्न राजपूत संगठनों के पदाधिकारियों को  दिखाई जानी चाहिेए। पद्मनी केवल राजपूतों के लिए ही सम्मानीय नहीं बल्कि वह नारी जाति की प्रतिष्ठा की सूचक है जिन्होंने दिदेशी आक्रांता के सामने झुकने की बजाय अपने को जहर की ज्वाला में कूदना बेहतर समझा।

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