चंडीगढ़, 14 नवंबर 2017:( पूजा गोयल )

लगभग 40 हफ्ते (महीनों) की सामान्य अवधि के बजाय सिर्फ 24 सप्ताह (6 महीने) में चैतन्या हॉस्पिटल में जन्मे बच्चे के मातापिता के लिए ये एक सपने के सच होने के समान है, कि बच्चा करीब 3 महीने तक अस्पताल में रहने के बाद अब अपने घर जा रहा है। ये कहना है कि बच्चे के पिता श्री गर्ग का। उनका कहना है कि वे सभी उम्मीदें खो चुके हैं, जब उन्होंने अपने नवजात शिशु को देखा जो जन्म के समय सिर्फ 640 ग्राम वजन का ही था।

उन्होंने बताया कि डॉक्टरों ने उन्हें कहा था कि ऐसे छोटे बच्चों के जीवित रहने की संभावना बहुत कम होती है, लेकिन बाल विशेषज्ञों की टीम द्वारा डिलीवरी के समय प्रारम्भिक चिकित्सा देखभाल को देखते हुए उन्हें आश्वासन दिया गया कि बच्चा सबसे सुरक्षित हाथों में रहने वाला है तो उन्होंने बच्चे का उपचार जारी रखने का निर्णय लिया। डॉ. जसकरण सिंह साहनी और डॉ.सरणजीत कौर ने अपनी कुशल एवं सक्षम मेडिकल टीम के साथ इस बच्चे को एक स्वस्थ बच्चे के तौर पर घर भेजने के लिए दिनरात काम किया।

मीडिया के साथ बातचीत करते हुए डॉ. जसकरण और डॉ.सरणजीत ने बताया कि चैतन्या हॉस्पिटल में नवीनतम चिकित्सा सुविधा ऐसे गंभीर अवस्था में पैदा हुए बच्चे का जीवन बचाने में उपयोगी  प्रमुख कारकों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि 37 सप्ताह की गर्भावस्था से पहले पैदा हुए शिशुओं को प्रीटर्म माना जाता है और 28 सप्ताह से पहले पैदा होने वाले बच्चों को माइक्रो प्रीमीज कहा जाता है। ऐसे बच्चों के बचने की बहुत कम संभावना है, यानि 30 प्रतिशत से भी कम होती है। भारतीय दिशानिर्देशों के अनुसार 24 सप्ताह और 500 ग्राम से कम वजन वाले नवजात शिशुओं के लिए जीवन की संभावना कम मानी जाती है।

यह बच्चा गर्भावस्था के 24 हफ्तों के बाद पैदा हुआ था जब उसकी मां प्रीटर्म लेबर में गई थी। मां को चैतन्या हॉस्पिटल में भेजा गया था और दाखिल होने के 2 घंटों के भीतर उन्होंने बच्चे को जन्म दे दिया था। बच्चे का सिर्फ 640 ग्राम वजन था और जन्म के बाद रोया भी नहीं और उसे तुरंत सांस देकर न्यूबोर्न आईसीयू में स्थानांतरित किया गया। चैतन्या हॉस्पिटल ने बच्चे को एनआईसीयू केयर प्रदान की। प्रारंभ में एक महीने तक बच्चे को कृत्रिम सांस, कृत्रिम पोषण, तय तापमान में रखने के लिए इनक्यूबेटर्स और दवाओं के साथ ब्लडप्रेशर को बनाए रखा गया।

शिशु के दिल में एक छेद भी था, जिसे नियोनैटोलॉजिस्ट डॉ. जसचरण सिंह और डॉ. सरणजीत कौर, चैतन्य हॉस्पिटल ने उपचार कर इलाज प्रदान किया। बेबी की आंखों में ऐसी स्थिति विकसित हो गई थी, जिसे प्रीमेच्योरिटी में रेटिनोपैथी कहा जाता है और लेजर थैरेपी के साथ इसका इलाज किया गया। इस दौरान लेकिन बच्चे और उनके मातापिता सभी बाधाओं से लड़ रहे थे और 9 सप्ताह तक बच्चा वेंटिलेटर पर ही अपनी सांसों को लेता रहा। वर्तमान में बच्चे का वजन 1800 ग्राम है और वह किसी भी बड़ी शारीरिक और न्यूरोलॉजिकल समस्या से पूरी तरह से मुक्त है और 36 सप्ताह की उम्र में घर जाने के लिए तैयार है।

28 हफ्तों से पहले जन्मे शिशुओं को एक बड़े संघर्ष का सामना करना पड़ता है क्योंकि उनका शरीर स्वयं को बनाए रखने में सक्षम नहीं है, उन्हें अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए नवीनतम मेडिकल और तकनीकी सहायता के साथ एक सुरक्षात्मक वातावरण की आवश्यकता होती है। चैतन्या हॉस्पिटल इस क्षेत्र में मदर और चाइल्डकेयर में प्रसिद्ध नाम है, जो कि लेवल 3 नीकू  केयर के साथ 24 घंटे नियोनेटोलॉजिस्ट की मौजूदगी के साथ केयर प्रदान करता है।

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