Chandigarh 4th April (Pooja Goyal):

बीता मंगलवार चण्डीगढ़ शहर में कला के क्षेत्र का ऐतिहासिक दिन साबित हुआ। नेशनल स्कूल आफ ड्रामा द्वारा आयोजित 8वें थियेटर ओलम्पिकस की सफल मेज़बानी चण्डीगढ़ में की। जिसमें परस्पर सहयोग रहा नेशनल स्कूल आफ ड्रामा द्वारा थियेटर ओलम्पिकस के चण्डीगढ़ संयोजक नियुक्त किये गये हरियाणा कला परिषद् के उपाध्यक्ष श्री सुदेश शर्मा जी और चण्डीगढ़ संगीत नाटक अकादमी।

समापन दिवस पर शहर के युवा कलाकारों से सीधे रूबरू होने पहुंची रंगमंच की पर्याय बन चुकी दिग्गज रंगकर्मी, अदाकारा, निर्देषक, गायक और संगीतकार डा0 रानी बलबीर कौर जी।

लाहौर में पैदा हुई रानी बलबीर कौर जी डिपार्टमेंट आफ इंडियन थियेटर पंजाब यूनिवर्सिटी से रंगमंच और संगीत दोनों में स्नातक हैं। डिपार्टमेंट आफ इंडियन थियेटर की नींव रखने वाले बलवंत गार्गी जी और अल्काज़ी सरीखे रंगमंच दिग्गजों के साथ सफर की शरूआत करने वाली रानी बलबीर कौर जी बताती है कि बंटवारे के बाद लगभग 6-7 साल की उम्र में वो यहां गये। इसलिए उन्हें “ First Citizen of Chandigarh”  का दर्जा भी प्राप्त है।

युवा कलाकारों को सलाह देते हुए रानी बलबीर कौर जी ने कहा कि संगीत से उन्हें शक्ति मिलती है। जिसका फायदा उन्हें अदाकारी और निर्देशन दोनों में बराबर मिलता है। युवा कलाकारों को उन्होनें सलाह दी कि वो किसी भी क्षेत्र में जाएं पर संगीत से जरूर जुड़े रहें। उनका संगीत प्रेम ही है, जिस वजह से उनकी हर प्रस्तुति में लाईव संगीत देखने को मिलता है।

डा0 रानी जी के अनुसार अपने 45 साल के असाधारण कैरियर में बतौर निर्देशक गायक अदाकार संगीतकार और लेखक उन्होनें बतौर प्रोफेसर भूमिका निभाई। पर डिपार्टमेंट आफ इंडियन थियेटर को कभी जूझते हुए नहीं देखा जैसे कि अब जूझ रहा है। सलाम है सुदेश शर्मा जैसे कलाकारों को जिन्होनें डिपार्टमेंट या नेशनल स्कूल आफ ड्रामा से डिग्री होल्डर ना होते हुए भी रंगमंच को नये आयाम दिये और 30 दिवसीय नाटय समारोह से लेकर 8वें थियेटर ओलम्पिकस का आयोजन चण्डीगढ़ में करवाया।

2014 में चण्डीगढ़ प्रशIसन द्वारा स्टेट अवार्ड, 2015 में संगीत नाटक अकादमी अवार्ड, 1984 में विश्व पंजाबी सम्मेलन में राष्ट्रीय पुरस्कार और अमेरिका में 1984 में रानी जिंदान के अपने किरदार को लेकर सम्मान पाने वाली रानी जी आज भी एक युवा कलाकार वाला सीखने का ज़ज्बा रखती है और हमेशा सीखते रहना चाहती हैं।

युवा कलाकारों का जल्दी में मुबंई का रूख ना करने की सलाह देते हुए रानी जी ने कहा कि उनके शिष्य अनुपम खेर, किरण खेर, हैरी बवेजा, माही गिल जैसे कलाकार शायद इसीलिए बड़े पर्दे पर कामयाब हैं क्योंकि उन्होनें रंगमंच को पर्याप्त समय दिया और पर्याप्त प्रशिक्षण भी लिया। इसीलिए युवा कलाकारों को 5-6 महीने थियेटर कर मंुबई जाने की जल्दबाजी से बचना चाहिए।

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