Pooja goyal

भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को बड़े ही भक्ति भाव और आनंद के साथ श्रीराधारानी जी का प्रकट महोत्सव( राधाष्टमी महोत्सव) श्री चैतन्य गौड़ीय मठ चंडीगढ़ में मनाया गया।
इस उपलक्ष्य में भारी मात्रा में भक्तों ने संकीर्तन में हिस्सा लेकर श्री राधारानी जी की महिमा का गुणगान किया
जिसमें सुबह 10.00 से देर शाम तक चले कार्यक्रम में सुबह 10.00 बजे संकीर्तन व श्री हरिकथा हुई, इस हरिकथा में राधारानी जी के बारे में बताया गया।दोपहर 12.00 बजे श्री राधारानी जी का पंचामृत के साथ अभिषेक कराया गया। अभिषेक के बाद 12.30 बजे राधारानी जी का अलौकिक शृंगार करके उनको छप्पन भोग लगाया गया। इसके बाद सभी को भगवद प्रसाद वितरित किया गया।
वामन महाराज जी ने बताया कि जगत जननी राधा को भगवान श्री कृष्ण की आह्लादिनी शक्ति माना गया है श्रीराधा अष्टमी का मतलब है श्रीराधा जी का प्राकट्य या उनकी जन्म लीला । भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को ही श्रीराधा जी का प्राकट्य हुआ। इससे पहले भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण का प्राकट्य हुआ, जिसको हम जन्माष्टमी कहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण की आराधिका शक्ति हैं श्रीराधा जी। इनके बिना कृष्ण अधूरे हैं। वृंदावन की अधिष्ठात्री हैं श्रीराधा जी । इनकी कृपा के बिना वृंदावन का या ब्रज का वास नहीं मिलता, इसलिए श्रीधाम वृंदावन में राधे-राधे ही उच्चारण होता है। राधा और कृष्ण एक ही है, इसलिए इनको युगल रूप कहा जाता है युगल सरकार कहा जाता है । इस जगत में विशुद्ध प्रेम को दिखाने के लिए दो रूपों से प्रकट हुए हैं। भगवान अपने मुख से कहते हैं कि मेरा कोई सौ बार नाम ले और राधा जी का एक बार ले ले, बराबर है । और जब तक राधा जी किसी पर कृपा नहीं करेंगी , तब तक मैं उसको दर्शन नहीं दूंगा , अगर मेरी कृपा की चाहना है तो पहले राधा जी की कृपा लेनी पड़ेगी । इसलिए भक्त लोग राधा कृष्ण दोनों की इकट्ठी पूजा करते हैं , अकेले कृष्ण कि नहीं। उन्होंने बताया कि पदम पुराण में बताया गया है कि 1000 एकादशी व्रत रखने का जो फल मिलता है उस से 100 गुना ज्यादा फल राधाष्टमी का व्रत रखने पर मिलता है।जबकि ये व्रत केवल दोपहर 12 बजे तक होता है। अभिषेक होने के बाद भक्त फिर कुछ भी खा सकते है।
अब देखिए व्रत कितना छोटा और फल कितना ज्यादा?
इस लिए हम सबको श्री राधाष्टमी का व्रत अवश्य रखना चाहिए।
श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पंद्रह दिन बाद अष्टमी को ही राधा जी का जन्मदिन मनाया जाता है। भविष्य पुराण, ओर गर्ग संहिता के अनुसार द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन महाराज वृषभानु की पत्नी कीर्ति के यहां भगवती राधा अवतरित हुई। तब से भाद्रपद -शुक्ल अष्टमी(राधाष्टमी) के नाम से विख्यात हुई, वैष्णव जन इस तिथि के दिन बड़ी श्रद्धा व उल्लास के साथ व्रतउत्सव करते है।
मठ सदस्य शाम सुंदर ने बताया कि श्री राधा जी वृषभानु की यज्ञभूमि से प्रकट हुई थी। वेद तथा पुराण में जिनको “श्यामा जू” कहकर गुणगान किया जाता है। श्री राधरानी जी के कारण ही श्री कृष्ण प्रसन्न होते है, क्योकि राधा जी श्री कृष्ण की आत्मा हैं। श्री राधोपनिषद में राधा जी का परिचय देते हुए कहा कि कृष्ण इनकी आराधना करते है इसलिए यह राधा है, ओर ये सदा कृष्ण की आराधना करती है। इसलिए राधिका कहलाती हैं, यह राधा और यह आंनद सागर श्री कृष्ण एक होते हुए भी लीला के लिए दो हो गए है, श्री राधिका श्री कृष्ण की प्राण है, इन राधरानी की अवहेलना करके जो श्री कृष्ण की भक्ति करना चाहता है, वह उन्हें कभी नही पा सकता।
श्री राधरानी की छवि से मंत्रमुग्ध हुए श्रद्धालु, राधे राधे गोविंद राधे, बरसाने वाली राधे, सारी दुनिया है दीवानी राधरानी आपकी, लाडली अदभुत नज़ारा तेरे बरसाने में है। आदि सुंदर भजनों का गान किया। इसी दिन राधाष्टमी पर ही राधरानी जी के चरण दर्शन(चरणों के दर्शन) भी करवाये गए, जो साल में सिर्फ राधाष्टमी पर एक ही बार होते है, चरण दर्शन के समय सांय 7.00 बजे से ही भक्तों की काफी संख्या में भीड़ थी।

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