Chandigarh 20 January (Pooja Goyal) :

सीएमजे विश्वविद्यालय, शिलांग, मेघालय अक्टूबर 2010 में अस्तित्व में आया, और 2012 के अंत तक सैंकड़ों पीएचडी डिग्रीयों सहित विभिन्न विषयों में हजारों की गिनती में डिग्रीयां बाँट दी गयी । बड़े पैमाने पर डिग्रियां बाँटने का मामला पता चलते ही तत्कालीन गवर्नर आरएस मूसाहिरी ने विश्वविद्यालय के विजिटर की क्षमता में 30-04-2013 को सीएमजे
विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त की गयी सभी डिग्रीयां वापस लेने के निर्देश दिए, और मेघालय सरकार को इस विश्वविद्यालय को बंद करने की सिफारिश की ।

सीएमजे विश्वविद्यालय/फाउंडेशन ने विजिटर के एस आदेश को मेघालय के माननीय उच्च न्यायालय में रिट याचिका के जरिए चुनौती दी थी, जिसे 16-05-2013 को खारिज कर दिया गया था । सीएमजे फाउंडेशन ने एस फैसले के खिलाफ डिवीजन बेंच के समक्ष अपील की, लेकिन वहां भी 31-05-2013 को हुए फैसले में सिंगल बेंच द्वारा पारित किए गए आदेशों को सही ठहराया गया । इस तरह से डिग्री वापस लेने और विश्वविद्यालय विघटन की सिफारिश को वैध ठहराते हुए निर्णय को कायम रखा गया ।

डिवीजन बेंच द्वारा पीड़ित, सीएमजे फाउंडेशन ने माननीय सुप्रीम कोर्ट में एक एसएलपी दर्ज की । पार्टियों की सुनवाई के बाद, न्यायमूर्ति जीएस सिंघवी की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने *13-09-2013* के अपने आदेश में मेघालय सरकार को
सीएमजे विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 की धारा 48 के अनुसार विश्वविद्यालय के विघटन की प्रक्रिया शुरू होने के निर्देश दिए और विश्वविद्यालय को सुनवाई का मौका देते हुए 3 महीने के भीतर फैसला देने को कहा, जिसे बाद में बड़ा कर 31-03-2014 कर दिया गया था । इसी एसएलपी में एक और आदेश भी दिया गया था कि जिन छात्रों की डिग्रियां अवैध घोषित कर दी गयी थी, उन्हें भी अपनी डिग्रियों की वैधता के लिए मेघालय सरकार को रिप्रजेंटेशन देने की अनुमति थी, और राज्य सरकार को कहा था कि वह उन्हें सुनवाई का अवसर प्रदान करते हुए सहानुभूतिपूर्वक उनके
मामलों पर विचार करके डिग्रियों के वैधता पर अपना निर्देश दें ।

तदनुसार, सीएमजे विश्वविद्यालय अधिनियम, 2009 की धारा 48 के तहत मेघालय सरकार ने सीएमजे विश्वविद्यालय को भंग करने का आदेश पारित किया । मेघालय सरकार के इस आदेश से पीडि़त विश्वविद्यालय ने मेघालय के उच्च न्यायालय में चुनौती दी । 16-07-2015 को एकल न्यायाधीश ने विश्वविद्यालय को भंग करने वाले मेघालय सरकार द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया । सिंगल जज के आदेश को सरकार द्वारा अपील के माध्यम से डिवीजन बेंच में चुनौती दी गयी, यहाँ वर्ष 2017 में सिंगल बेंच का फैसला ख़ारिज कर दिया गया । सीएमजे यूनिवर्सिटी ने सर्वोच्च न्यायालय में एक
एसएलपी दायर की जिसमे एक अंतरिम आदेश के जरिए उच्च न्यायालय के हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी, और एसएलपी अंतिम फैसले के लिए लंबित है । *इसलिए विश्वविद्यालय के विघटन का मुद्दा अभी तक समाप्त नहीं हुआ है, क्योंकि वह सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है।*

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के 13-09-2013 के आदेश के दुसरे निर्देश के अनुसार जिन छात्रों की डिग्रीयां रद्द कर दी गई थी, उन्हें मेघालय सरकार को रिप्रजेंटेशन देने का मौका दिया गया था । राज्य सरकार ने 25 फरवरी से 28 मार्च, 2014 के बीच ऐसे सभी छात्रों को व्यक्तिगत सुनवाई देते हुए, उनके द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों की छानबीन और उनकी याचिका पर विचार करने के बाद, सभी डिग्रीयों को अमान्य घोषित कर दिया । सरकार द्वारा यह फैसला उच्चतर और तकनीकी शिक्षा
निदेशालय के माध्यम से दिया गया । यह निर्णय पंजीकृत डाक के माध्यम से उन सभी छात्रों को भेजा गया, जिन्होंने सरकार को रिप्रजेंटेशन दी थी । इस ऑर्डर से प्रभावित छात्रों में से किसी ने भी उच्च-प्राधिकरण या किसी अदालत के समक्ष कोई अपील दायर नहीं की । इस प्रकार *मेघालय सरकार द्वारा दिए गए आदेश****सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार छात्रों की डिग्रियों को अवैध घोषित करते हुए फाइनल हो गए।*

*आरटीआई से हुआ खुलासा*

चंडीगढ़ के आरटीआई एक्टिविस्ट डा. राजिंदर के. सिंगला द्वारा दायर आवेदन के जवाब में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा निदेशक, सीपी गोटमेरे से प्राप्त उत्तर की प्रति से साबित होता है कि *सुनवाई समिति के समक्ष पहुंचे सभी **3592**
आवेदकों की डिग्रियों को अवैध घोषित किया गया था**,** और आगे भी विशेष रूप से पुष्टि की गयी है कि राज्य सरकार का यह निर्णय अंतिम था* ।

*मंदीप जोसन के मामले में विशेषतौर पर स्पष्ट किया गया है कि वह **25-03-2014** को सुनवाई समिति के पास शिलोंग में उपस्थित हुई व् सुनवाई के पश्चात कंप्यूटर विज्ञान में उनकी पीएचडी की डिग्री को मेघालय सरकार ने **31-03-2014 **को अमान्य घोषित कर दिया था, और **21-07-2014** को पंजीकृत डाक द्वारा उन्हें यह फैसला भेज दिया गया था ।*

लेकिन विडंबना यह है कि पीयू के कुलपति ने, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पूरा उल्लंघन करते हुए, मनदीप जोसन की डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ में सहायक प्रोफेसर के रूप में हुई नियुक्ति को मंजूरी दी । यह वही कॉलेज है जिसमे मंदीप जोसन के पिता डा. बी.सी. जोसन प्रिंसिपल हैं, और वह पंजाब विश्वविद्यालय के सीनेटर भी हैं.

*यह न केवल हेरफेर**, **भाई-भातिजाबाद और पक्षपात का एक स्पष्ट मामला है**, **बल्कि भ्रष्टाचार और शैक्षणिक धोखाधड़ी का भी मामला है**, **तथा सीबीआई द्वारा इस धोखाधड़ी और नियमित रूप से विश्वविद्यालय में फैली अन्य अवैधताएं की जांच होनी

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